Prerak Prasang Book

Hindi Story for Kids with Moral - प्रेरक प्रसंग

यही सेवा है और यही समर्पण है

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जापान-यात्रा के मध्य, जहाज पर स्वामी रामतीर्थ की एक अमरीकी बुद्धजन से भेंट हुई। यह महाशय यात्रा में अधिकांश समय नई भाषा सीखने में ही मग्न रहते थे। स्वामी रामतीर्थ ने उनसे पूछा - " आप-रात दिन इस यात्रा में क्या पढ़ते रहते हैं?" वृद्ध ने बड़ी नम्रता से कहा " मैं भूगर्भ-शास्त्र का प्रोफेसर रहा हूं। मैं संसार की 11 भाषाएं लिख-पढ़ सकता हूं। अब मैं रूसी भाषा सीख रहा हूं।" 70-75 वर्ष की आयु में भी यह 12वीं भाषा सीखना और इतना कष्ट सहन करना, आखिर क्यों ? यह प्रश्न स्वामी रामतीर्थ को विस्मय में डाल रहा था।

अंततः उन्होंने पूछ ही लिया, " प्रोफेसर साहब ! इतना कुछ तो आप पढ़-पढ़ा चुके । अब शेष आयुक्तों भागवत भजन में लगानी चाहिए, जिससे आप को शांति मिले।"

प्रोफेसर ने उत्तर दिया,  " अभी कुछ दिन पूर्व रूस में भूगर्भ शास्त्र पर एक बहुत उत्तम ग्रंथ छपा है। मैं चाहता हूं कि उसका अपने देश की भाषा में अनुवाद करके उसे अमेरिकी छात्रों के लिए भी उपलब्ध कराऊँ। यदि मैं इसमें सफल हो गया, तो इससे मेरे देश को पर्याप्त लाभ होगा। रही ईश्वर आराधना की बात, तू मेरा विश्वास है कि समाज-सेवा भी प्रभु-भक्ति है, यही सेवा है और यही समर्पण है ।"
यह कहकर वृद्ध प्रोफेसर फिर रूसी भाषा की 'प्रथम शिक्षण पुस्तक' को पढ़ने में लग गए। स्वामी रामतीर्थ मन ही मन उनकी देशभक्ति पर मुक्त होते रहे।


 सोचो तो

" अरे, ओ जीवन के साधकों ! तुम निचली डाल का फूल तोड़ कर लौटे जा रहे हो, तो फिर फुनगी पर यह लाल-लाल आम किसके वास्ते है? 
 -रामधारी सिंह दिनकर

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