Prerak Prasang Book

आचार्य चाणक्य की प्रेरणादायक कहानी । अपने बच्चों को ऐसी नैतिक कहानियां जरूर सुनाएं।

 आचार्य चाणक्य - प्रेरक प्रसंग 

 "राष्ट्र का दीपक"

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सम्राट सिकंदर का सेनापति सेल्यूकस मगध के महामंत्री चाणक्य से मिलने की इच्छा लेकर मगध की राजधानी के राजमार्ग से निकला। धनिकों की बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं बाजार की चकाचौंध और ऐश्वर्या देखकर वह आश्चर्य में डूब गया। सोचा, इन्हीं में से से कहीं महामंत्री चाणक्य का भी भी महल होगा।
जब सामान्य जनों का इतना ऐश्वर्य तो महामंत्री का ऐश्वर्य कैसा होगा! इन्हीं विचारों में डूबा सेनापति एकाएक चौंका। " अरे, नगर तो पीछे छूट गया। कहां ले जा रहे हो ? उसने राजसैनिक से प्रश्न किया। " महामंत्री का निवास निकट ही है।" एक झोपड़ी की ओर इंगित करके सैनिक ने उत्तर दिया। " पर्ण कुटी में दुनिया के सबसे शक्तिशाली सम्राट के महामंत्री का आवास ?"  सेनापति को विश्वास ना हुआ। सेनापति ने झोपड़ी में प्रवेश किया और दंग रह गया। देखा कि एक व्यक्ति छोटी सी धोती और एक साफा धारण किए एक कंबल बिछाए दीपक के प्रकाश में कुछ लिख रहा है। सेनापति ने उन्हें अभिवादन करते हुए कहा- " मैं आपसे कुछ व्यक्तिगत बातें करना चाहता हूं।"
 महामंत्री बोले "अवश्य" उन्होंने अपने सेवक को आवाज दी, " यह दीपक ले जाओ, दूसरा दीपक ले आओ।"  सेवक आशय समझ गया। पहला दीपक बुझा कर दूसरा दीपक जला दिया गया। वार्तालाप प्रारंभ हो गया, पर सेनापति के मन में बड़ा कौतूहल था के मन में बड़ा कौतूहल था था। एक दीपक बुझा कर उसी प्रकार का दूसरा दीपक क्यों जलाया गया। रहस्य क्या है ? आखिर उससे न रहा गया। रहा गया। चलते चलते उसने महामंत्री से प्रश्न किया, " महामंत्री धृष्टता के लिए क्षमा करें तो एक प्रश्न पूछूं?" महामंत्री ने कहा,  "नि:संकोच"
" मेरे आगमन पर आपने एक दीपक बुझाया, और दूसरा दीपक जलाया । पर  दीपको में तो कोई अंतर नहीं दिखता। रहस्य क्या है?"  महामंत्री हंसे और बोले, " भाई रहस्य कुछ नहीं । जब आप आए तो मैं राज्य का कार्य कर रहा था। उस समय मैंने उस दीपक से कार्य किया जिसमें राज्य के धन का तेल जलता था। परंतु आपसे व्यक्तिगत बात करनी थी, अतः  मैंने उस दीपक को बुझा दिया, और दूसरा दीपक जलवाया, जिसमें मेरे निजी धन का धन का का तेल जलता है।"
सेनापति अपने मन में सोचने लगा, जब इस देश में चाणक्य जैसे महामंत्री रहेंगे यह देश कभी भी पराजित ना होगा।

"आदमी अपने जन्म से नहीं अपने कर्मों से महान होता है।" ~ आचार्य चाणक्य

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