Prerak Prasang Book

Prerak Prasang | Begum Hazrat Mahal | प्रेरक प्रसंग

हिंदुस्तानी रिवाज
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बेगम हजरत महल 
घटना सन 1857 की है | स्वतंत्रता संग्राम के सैनिकों ने लखनऊ के क्रांतिकारियों से मिलकर अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे | कई अंग्रेज अधिकारी और सैनिक बंदी बना लिए गए | बेगम हजरत महल स्वयं घोड़े पर बैठकर इन क्रांतिकारियों का नेतृत्व कर रही थी | आधी रात हो गई थी | बेगम हजरत अभी भी जाग रही थी | चारों तरफ मारो-काटो के स्वर गूंज रहे थे | तभी क्रांतिकारियों के सरदार दलपत सिंह महल में पहुंचे | वे बेगम से बोले बेगम हुजूर आपको एक सलाह देने आया हूँ |"
"वह क्या? " बेगम ने पूछा |

"आप कैदी फिरंगियों को मुझे सौंप दीजिए | मैं एक- एक के हाथ पैर काट कर अंग्रेजों की छावनियों में भेजूँगा | " बात करते-करते दलपत सिंह का चेहरा घृणा से भर उठा |

"नहीं,  हरगिज़ नहीं!" बेगम के लहजे में कठोरता आ गई | " हम कैदियों के साथ ऐसा व्यवहार न तो खुद कर सकते हैं और ना किसी को इसकी इजाजत दे सकते हैं | कैदियों पर जुल्म ढाने का रिवाज हमारे हिंदुस्तान में नहीं है | युद्ध अपनी जगह है | वह अपने तरीके से लड़ा जाएगा | लेकिन हमारे जीते जी फिरंगी कैदियों और उनकी औरतों पर जुल्म नहीं होगा | कैदियों के साथ मानवता का व्यवहार ही किया जाए यह शाही आज्ञा है |"

" बेगम हुजूर की जैसी आज्ञा | " कहकर सरदार दलपत सिंह बेगम हजरत महल को सिर झुकाकर अपने शिविर में लौट आए |

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