Prerak Prasang Book

मलेथा की गूल माधो सिंह भंडारी के बलिदान और सघर्ष की प्रेरणादायक कहानी | प्रेरक प्रसंग

मलेथा की गूल "प्रेरक प्रसंग"

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मलेथा की गूल
माधो सिंह भंडारी गढ़वाल के राजा महीपत शाह के दरबार में सेनापति थे । राजा का दीवान अक्सर देर से दरबार में आता था । एक दिन महाराजा ने उससे पूछा, " तुम देर से क्यों आते हो ? जबकि तुम्हारा ही साथी माधो सिंह भंडारी ठीक समय पर आता है । " दीवान ने अपने को बचाने के लिए कहा, " महाराज, माधो सिंह के गांव में सिर्फ मंडवा,  झंगोरा, गहथ जैसे मोटे अनाज होते हैं, जिन्हें पकाने में देर नहीं लगती । लेकिन मेरे गांव में तो गेहूं और धान जैसी फसलें होती है जिन्हें पकाने, खाने में देर हो जाती है। " इस प्रकार दीवान तो बच गया लेकिन माधो सिंह भंडारी को यह बात चुभ गई । वे दरबार से छुट्टी लेकर घर चले गए।

एक दिन माधो सिंह भंडारी घर पर बैठे-बैठे कुछ सोच ही रहे थे कि उनकी नजर एक चुहिया पर पड़ी। वह अपने रहने के लिए बिल बनाने में जुटी थी । यह देखकर माधो सिंह भंडारी कि मन में विचार आया कि जब एक चुहिया अपने रहने के लिए बिल बना सकती है तो क्या मैं इस पहाड़ को खोदकर सुरंग नहीं बना सकता? "

माधो सिंह भंडारी ने जब पहाड़ में सुरंग बनाना आरंभ कर दिया । माधो सिंह भंडारी को अकेले इस काम पर जुटा देखकर लोग हंसने लगे और कहने लगे, "माधो! कभी पहाड़ पर भी कोई सुरंग बना सकता है ? यह असंभव काम है । अपना हठ छोड़ दे ।"

लेकिन बात के धनी माधो सिंह भंडारी उनकी बातों को अनसुना करके अपने काम में जुटे रहे । जब माधो सिंह भंडारी ने अकेली आधी सुरंग खोद दी तब शर्म के मारे गांव के लोग भी गैंती, सब्बल और बेलचे लेकर उनका सहयोग करने लगे। सुरंग बनाते समय माधो सिंह भंडारी का पुत्र सुरंग के अंदर दब कर मर गया फिर भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया वे काम पर जुटे रहे । कुछ दिनों में सुरंग बनकर तैयार हो गई और उससे माधो सिंह भंडारी के गांव तक पानी आने लगा । गांव में गेहूं और धान जैसी फसलें लहलहा उठी ।

माधो सिंह भंडारी के इस गांव का नाम है मलेथा । मलेथा गांव श्रीनगर-ऋषिकेश मोटर मार्ग पर स्थित है । आज भी पूरे गढ़वाल में माधो सिंह भंडारी की याद में गीत गाए जाते हैं ।

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